इस समय मैं यही सोच रहा था कि वही उद्धत और चंचल मालती आज कितनी सीधी हो गई है, कितनी शांत, और एक अखबार के टुकड़े को तड़सती है...... यह क्या, यह... ।
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इस समय मैं यही सोच रहा था कि वही उद्धत और चंचल मालती आज कितनी सीधी हो गई है, कितनी शांत, और एक अखबार के टुकड़े को तड़सती है...... यह क्या, यह... ।

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रोज कहानी की इन पंक्तियों में अज्ञेय जी का आशय मालती के अतीत और वर्त्तमान जीवन की भिन्नता और विषमता का चित्रण करते हुए इस बात की ओर संकेत करना है कि ऐसा क्यों हुआ है। लेखक कारण की ओर स्पष्ट निर्देश नहीं कर पाता है। लेकिन लगता है कि अतीत के उन्मुक्त जीवन की अभ्यासी मालती को वर्त्तमान दाम्पत्य जीवन की एक यांत्रिक क्रिया रेखा ने कुठित घर दिया है। इस कुंठा के कारण समन्वय के अभाव में अपने भीतर संघर्ष करती हुई मालती धीरे-धीरे तन और मन दोनों से दयनीय होती जा रही है।

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